सैयद हाशिम अलमूसवी ने तस्नीम न्यूज़ एेजेंसी से बात करते हुए कहा कि ईरानी कमांडर अत्यंत विनम्र और निष्ठापूर्ण होते हैं और इसी वजह से लोग उनकी ओर खिंचे चले आते हैं। उन्होंने बताया कि सैन्य अभियानों के दौरान सलाहकारों की भूमिका निभाने वाले ईरानी सैन्य कमांडर इस प्रकार का व्यवहार करते थे मानो वे एक साधारण इंसान हों और वे सैनिकों के बीच ही रहते थे। उन्होंने बताया कि एक बार उन्होंने एक ईरानी कमांडर से युद्ध की कठिनाई और शहीदों व घायलों की संख्या के बारे में पूछा तो उन्होंने बड़े ठोस स्वर में कहा कि युद्ध जारी है और यही ख़ून हमें विजय दिलाएगा। उन्होंने एक क्षण भी आराम नहीं किया और जैसे ही वह अभियान समाप्त हुआ उन्होंने तुरंत ही अगले अभियान की तैयारी शुरू कर दी। अन्नुजबा आंदोलन के प्रवक्ता ने बताया कि हम पर ईरान के सैन्य सलाहकारों की रक्षा का दायित्व था लेकिन मैं देखता था कि वे हमसे भी आगे होते थे और कभी भी आॅप्रेशन रूम में बैठे नहीं रहते थे बल्कि अग्रिम पंक्ति पर पहुंचे होते थे।
सैयद हाशिम अलमूसवी ने कहा कि ईरानी बिलकुल भयभीत नहीं होते थे और यही कारण है कि बहुत से ईरानी कमांडर इन अभियानों में शहीद व घायल हुए। उन्होंने बताया कि एक बार एक ईरानी कमांडर से मैंने कहा कि बहुत तीव्र झड़पें हो रही हैं और अगर संभव हो तो आप नमाज़ को विलम्बित कर दें लेकिन मैंने देखा कि उन्होंने तेज़ी से नमाज़ अदा की और फिर अपने काम में व्यस्त हो गए। मैंने उनसे पूछा कि आपकी अभिलाशा क्या है? उन्होंने जवाब दिया कि मैं इस्लाम की राह में शहीद होना चाहता हूं। इराक़ के अन्नुजबा आंदोलन के प्रवक्ता ने कहा कि इस प्रकार की बातों ने इराक़ियों पर बहुत प्रभाव डाला। उन्होंने कहा कि मेरे विचार में हर ईरानी सैन्य परामर्शदाता अपने आप में एक पाठशाला है। वे कभी भी हमसे अकड़ कर बात नहीं करते थे बल्कि उनका व्यवहार एेसा होता था कि जिसे बताना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरानी कमांडर हमें अपने अस्तित्व का ही भाग समझते थे और इराक़ी जनता अब भी जनरल क़ासिम सुलैमानी को उनकी विनम्रता और निष्ठा के कारण दिल से चाहती है और दोनों ही एक दूसरे को अपना समझते हैं।